Thursday, January 19, 2012

है राम के वुजूद पे हिन्दोस्तां को नाज़

लबरेज़ है शराबे हक़ीक़त से जामे हिन्द          
सब फ़लसफ़ी हैं खि़त्ता ए मग़रिब के राम ए हिन्द 


यह हिन्दियों के फ़िक्र ए फ़लक रस का है असर
रिफ़अ़त में आसमां से भी ऊंचा है बामे हिन्द


इस देस में हुए हैं हज़ारों मलक सरिश्त
मशहूर जिनके दम से है दुनिया में नाम ए हिन्द


है राम के वुजूद पे हिन्दोस्तां को नाज़
अहले नज़र समझते हैं उसको इमाम ए हिन्द


ऐजाज़ उस चराग़ ए हिदायत का है यही
रौशनतर अज़ सहर है ज़माने में शाम ए हिन्द


तलवार का धनी था शुजाअत में फ़र्द था
पाकीज़गी में जोश ए मुहब्बत में फ़र्द था 

- अल्लामा इकबाल 


 - बागे दिरा मय शरह उर्दू से हिन्दी, पृष्ठ 467, एतक़ाद पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली 2


लबरेज़-लबालब भरा हुआ, शराबे हक़ीक़त-तत्वज्ञान, ईश्वरीय चेतना, आध्यात्मिक ज्ञान, खि़त्ता ए मग़रिब-पश्चिमी देश, राम ए हिन्द-हिन्दुस्तान के अधीन (‘राम‘ यहां फ़ारसी शब्द के तौर पर आया है जिसका अर्थ है आधिपत्य), फ़िक्र ए फ़लक रस-आसमान तक पहुंच रखने वाला चिंतन, रिफ़अत-ऊंचाई, बामे हिन्द-हिन्दुस्तान का मक़ाम, मलक सरिश्त-फ़रिश्तों जैसा निष्पाप, अहले नज़र-तत्वदृष्टि प्राप्त ज्ञानी, इमाम ए हिन्द-हिन्दुस्तान का रूहानी पेशवा, ऐजाज़-चमत्कार, चराग़ ए हिदायत-धर्म मार्ग दिखाने वाला दीपक, रौशनतर अज़ सहर-सुबह से भी ज़्यादा रौशन, शुजाअत-वीरता, पाकीज़गी-पवित्रता, फ़र्द-यकता, अपनी मिसाल आप 

Tuesday, November 29, 2011

अब ये भी है बहुत कि तुम्हें याद आ सकूँ


दुनिया का सबसे बड़ा सच यह है कि इंसान के लिए यह मेहमानखाना है, और यहाँ आये हर इक मेहमान  के लिए लौटना उसका नसीब है. लकिन सबसे दुखद बात यह है कि हर इक यह सोचता है कि यह उसकी हमेशा-हमेश रहने की जगह है और वह सोचता है कि कोई उसे नहीं देख रहा है, इसलिए जो चाहे मनमानी कर ले. हालाँकि रात-दिन लोगो को अगले सफ़र पर जाते हुए देखता है, फिर भी आँख खुलती नहीं और जब जब खुलती है तब आँखे  बंद होने का वक़्त अनकरीब आ पहुँचता है. ऐसे में सफ़र में साथ ले जाने के लिए उसके पास कोई साजो-सामान नहीं होता. भाई-अहबाब, यार-दोस्त, मालो-दौलत सुपुर्दे ख़ाक होने तक ही साथ निभाते हैं. और अच्छे अमल किये नहीं होते जो अगले सफ़र में साथ दे सकें.

बहरहाल, मुझे जगन्नाथ आज़ाद साहब की यह ग़ज़ल बहुत पसंद है, आपके भी पेशे-नज़र है:-


मुमकिन नहीं कि बज़्म-ए-तरब फिर सजा सकूँ
अब ये भी है बहुत कि तुम्हें याद आ सकूँ

ये क्या तिलिस्म है कि तेरी जलवा-गाह से
नज़दीक आ सकूँ न कहीं दूर जा सकूँ

ज़ौक़-ए-निगाह और बहारों के दरमियाँ
पर्दे गिरे हैं वो कि न जिनको उठा सकूँ

किस तरह कर सकोगे बहारों को मुतमइन
अहल-ए-चमन जो मैं भी चमन को मना सकूँ

तेरी हसीं फ़िज़ा में मेरे ऐ नए वतन
ऐसा भी है कोई जिसे अपना बना सकूँ

'आज़ाद' साज़-ए-दिल पे है रक़सां के ज़मज़मे
ख़ुद सुन सकूँ मगर न किसी को सुना सकूँ

Monday, August 16, 2010

खूबसूरत, लेकिन पराई युवती को निहारने से बचें

पराई युवती को निहारने से बचना चाहिए, उसपर अगर वह खूबसूरत भी हो तो मामला और भी गंभीर हो जाता है, क्योंकि इससे आपके हॉर्मोन का स्तर में सिर्फ 5 मिनट में इतना अधिक बढ़ सकता है, कि आपके दिल के लिए दर्द का सबब बन जाए।

न्यूज पेपर 'डेली मेल' ने बताया कि एक रिपोर्ट के मुताबिक स्पेन के शोधकर्ताओं ने अपने स्टडी में यह निष्कर्ष निकला है कि अजनबी खूबसूरत महिलाओं को देखकर पुरुष का मन विचलित हो जाता है, जो उड़ते प्लेन से नीचे कूदने जैसा है। स्टडी में कहा गया है कि इससे खून में मौजूद कॉर्टिसोल हॉर्मोन का स्तर बढ़ने से दिल का दौरा भी पड़ सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक शोधकर्ताओं का कहना है कि यह मानसिक तनाव लंबे समय तक रहने से कॉर्टिसोल का स्तर लगातार बढ़ है, जिससे स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। इससे हाइपर टेंशन और शरीर में कई अन्य गड़बड़ियां पैदा हो सकती हैं। शोधकर्ताओं ने इस शोध के लिए 84 छात्रों पर अध्ययन के अंतर्गत उन्हें खूबसूरत अजनबी महिलाएं दिखाकर, उनके कॉर्टिसोल के स्तर में हुए बदलाव को दर्ज किया।